तन तो आज स्वतंत्र हमारा लेकिन मन आजाद नहीं - गोपालदास सक्सेना 'नीरज4 जनवरी, 1925 ग्राम-पुरावली, (जिला-इटावा) उत्तर प्रदेश में जन्में कवि गोपालदास नीरज का आज जन्मदिन है ।
उन्हें हम हिंदी साहित्य में अध्यापन से लेकर कवि सम्मेलनों में एक अलग अंदाज का काव्य वाचन तथा फिल्मों के लिए गीत लेखन के लिए जाने जाते हैं।
भारत सरकार की ओर से शिक्षा और साहित्य में दो बार 'पद्म श्री और 'पदम भूषण से सम्मानित।
गोपालदास नीरज जी को सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए तीन बार 'फिल्म फेयर के पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को ब्रिटिस शासन के आगरा -अवध प्रांत जोकि अब उत्तर प्रदेश है के इटावा जिले के पुरावली गांव में ब्रजकिशोर सक्सेना के यहां हुआ था।
मात्र 6 बर्ष की आयु में इनके पिता का देहान्त हो गया था । इन्होंने 1942 में एटा जिले से हाई स्कूल
प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। शुरूआती दौर में इटावा की कचहरी में नीरज जी ने कुछ दिन टाइपिस्ट का काम किया। उसके बाद कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्क की नौकरी की। फिर बाल्कट ब्रदर्स कम्पनी में 5 साल लगातार बतौर टाइपिस्ट काम किया । नौकरी के दौरान ही प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1953 तक उन्होंने हिन्दी साहित्य से प्रथम श्रेणी में एम. ए. किया।
मेरठ कॉलेज में कुछ समय तक हिन्दी pravakta रहे गोपालदास नीरज पर अध्यापन कार्य के दौरान ही कॉलेज प्रशासन ने कक्षाएं नहीं लेने और रोमांस करने के आरोप लगाए। जिनसे खफा होकर नीरज जी ने स्वयं इस्तीफा दे दिया।
कहानी यहीं नहीं रुकी इसके बाद गोपालदास सक्सेना ने अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक के रूप में ज्वाइन किया।
इन्हीं दिनों कवि सम्मेलनों में मिल रही अपार सफलता के चलते इन्हें मुम्बई की एक फिल्म (नई उमर की नई फसल) के गीत लिखने का आमंत्रण मिला।
पहली ही फिल्म में इनके लिखे कुछ गीतों को (जैसे 'कारवां गुजर गया ,गुबार देखते रहे
और 'देखती ही रहो आज दर्पन न तुम, प्यार का ये महूरत निकल जाएगा) काफी सराहना मिली। जिसका पणिाम यह हुआ कि वह मुम्बई रहकर फिल्मों के लिए गीत लेखन का कार्य करने लगे ।
ये सिलसिला ' मेरा नाम जोकर , शर्मीली और प्रेमपुजारी जैसी बहुचर्चित फिल्मों से होता हुआ कई बर्षों तक बदस्तूर जारी रहा ।
मुशायरों में उनका एक शेर आज भी बड़े अदब से सुना जाता है ।
इतने बदनाम हुए हम इस जमाने में ,लगेंगी सदियां आपको हमें भुलाने में।
न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, एैसे भी लोग चले आए हैं मयखाने में
ज्यादा दिन उनका मन बम्बई में रमा नहीं उचटे मन से वो वापस अलीगढ़ लौट आए और अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीने लगे जिसमें कवि सम्मेलन और मुशायरों का दौर फिर चल निकला ।
अभी भी 88 बर्ष के होने के वाबजूद वो सम्मेलनों में बाकायदा शरीक होते हैं।