Tuesday, August 14, 2012

वृन्दावन में विधवाओं की हो रही दुर्गति

हर माह भारत के बंगाल, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और  मध्य प्रदेश
आदि क्षेत्रों से बुजुर्ग माताएं,विधवाएं  भगवान् कृष्ण नगरी वृन्दावन में अपना जीवन यापन करने आती हैं | जहाँ उन्हें दो जून की रोटी तक नसीब नहीं हो रही है
दोस्तों इस विषय के बारे में पता चला ह्रदय विचलित हो उठा सोचा बात आप तक भी पहुंचे ऐसी कोशिश कर रहा हूँ | बात घर के बुजुर्गों की हो रही है बात उन महिलाओं की हो रही है जिनकी शादी अपने से दो गुनी उम्र के मर्द से कर दी गयी या जब वो दस ग्यारह साल की थी तभी उनकी शादी बीस बाईस साल के लड़के  से कर दी गयी जिसका परिणाम वो महिलाएं आज भुगत  रही है यहाँ  बंगाल  उड़ीसा मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से वृद्धाएँ हर माह वृन्दावन पहुँच रही हैं जिनमे बंगाल की महिलाओं की संख्या सर्वाधिक है जब हमारी टीम ने उन विधवाओं से बात की तो उन्होंने बताया की वो सत्संग करके रोज 8  रुपये कमाती हैं |सुबह जब चार घंटे सत्संग का 4   रूपया  मिलता  हैं  इसी तरह शाम को चार घंटे सत्संग करने पर चार रुपये  और इसी तरह एक महीने में 240  रुपयें में रहने को मजबूर हैं विधवाएं | तमाम एन जी  ओ  इस बात  का दंभ भरते हैं की वो विधवाओं को एक वक्त की रोटी देते हैं लेकिन उनकी पहुँच कुछ एक विधवाओं तक ही सीमित रह गयी है वृन्दावन में लगभग 20  हजार  विधवाएं हैं जोकि भीख मांग कर ,किसी के घर बर्तन साफ़ कर गुजारती है समय ....क्योंकि वो बेघर हैं उन्हें कही आसरा नहीं मिला बसेरा नहीं मिला कही खाना नहीं मिला
अब आप ये बताओ आज के ज़माने में कोई एक दिन का खर्च भला 8  रुपये में चला सकता है  | लेकिन शायद खुदा है उन माताओं का जो उन्ही आठ रुपये को खर्चती और जमा करती है जिससे उनका रहने का किराया जो अमूनन 200  रुपये लिया जाता है वो भी देतीं है | हमारी टीम  से बात करते हुए एक विधवा महिला बुरी तरह रो पड़ी शायद इन आंसुओं  से बहुत पुराना रिश्ता रहा उसका | "महिला ने बताया की 11  बरस की थी तब मेरा  40 बरस के आदमी  से ब्याह हो गया  गयी मेरे दो लाला भी हैं उनकी भी उनका ब्याह भी मैं कर चुकी है हमरा आदमी 8  बरस पहले मर गया फिर मैं अपने ललन तीर रही | वे हमें रोटी नहीं देते थे कहते दूसरा लड़का के पास जाओ और दूसरा के पास जाओ तब वो बहु कहती उकरे के पास रहो मै थक गयी थी बुढ़ापे में काम नहीं होता था शरीर से तब मैं सब छोड़ कर चली आई" |ये पूछने पर की आपको अब अपने बच्चों की याद नहीं आती तब महिला ने रोते हुए बताया कि हमरे लिए किसी के पास टीम ही नयी है ऊ लोग मजदूरी करता है अपने बच्चों का पेट पलता है इधर मैं अपना पेट के खातिर पड़ा है अब मैं उस देश कभी नहीं जाउंगी वृन्दावन में ही मर जाउंगी | फिर हमारी बात एक एन जी ओ संचालिका से हुयी जहाँ नए रहष्यों से पर्दा उठाना लाजिमी था |एन जी ओ संचालिका तक़रीबन 50  बर्षीय महिला है जोकि खुद इश्वर कि सताई  हुई है वो भी विधवा ही हैं वो एक स्वतंत्र संस्था चलती हैं जिसमे विधवाओं कि देखरेख और भोजनादि का प्रबंध शामिल है | उनसे ये पूंछने पर कि हमने यहाँ सुना है कि कई विधवाओं के मरने के बाद लाश को टुकड़ों में काट कर फेंक दिया जाता है क्यूँ कोई इतनी जहमत नहीं उठाता कि शव का अंतिम संस्कार जैसे भी हो सके करवाना चाहिए अगर वो भी नहीं तो कम से कम दफ़न ही करवा दिया जाया करे ? एन जी ओ संचालिका -आपका आरोप गलत नहीं है यहाँ पिछले कुछ महीनो में ऐसी घटनाये सामने आई है की मानवता शर्मशार हुई है तकरीवन एक सप्ताह पहले की घटना है एक बुढ़िया के मर जाने पर मकान मालिक ने सफाई वाले को बुलाकर शव को उससे  बहार फिंकवा दिया और बाद में पता चल की सफाई वाला शव को एक बोरे में तोड़ मरोड़कर भर के ले गया था और कही रस्ते में ही किनारे फेंक कर चला आया इस काम के उसे 200  रुपये मिले थे | शायद आपको कुछ और नहीं बताना पड़ेगा थोडा बहुत अंदाजा हो गया होगा आपको भी वृन्दावन में वृद्दों की हालत का मंदिर ,सडक ,मोहल्ले ,रेलवे स्टेशन ,बस स्टैंड ,गुरूद्वारे के बाहर कही भी ये विधवा महिलाएं आपको भीख मांगती दिख जाएँगी |मैंने इनकी संख्या एक एन जी ओ के माध्यम से 20 ,000  आंकी है | कुछ सुझाव निम्नलिखित है ...

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